छठ व्रत एवं गयाजी के तीन प्राचीन सूर्यमंदिर
आचार्य मनोज कुमार मिश्र’पद्मनाभ’
साम्ब पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के द्वारा अपने शारीरिक व्याधि को दूर कर स्वास्थ्यलाभ हेतु भगवान सूर्य के आदेश से शाकद्वीप से मग ब्राह्मणों को जब लाया गया तो उन्होंने सविधि सूर्योपासना के माध्यम से इनके सफेद कुष्ठ से अस्वस्थ शरीर को नैरोग्यता प्रदान की।तब से ही भारत जैसे विशाल देश में सूर्योपासना का महत्व विशेष रूप से बढ़ गया।कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी और सप्तमी तिथि को इसके विशेष अनुष्ठान पर प्रकाश डालते हुए इन मगद्विजो़ ने इसकी विधि भी बताई और जनसामान्य के लिये इसे बहुत ही सुलभ बताया।इस व्रत का विधान बताते हुए इन्होंने कहा कि इस पूजा अनुष्ठान में किसी जाति या वर्ग का कोई विभेद नहीं है।साथ ही इस अनुष्ठान की सम्पन्नता हेतु आचार्य या पुरोहित की भी आवश्यकता नहीं।
इसके अनुष्ठान हेतु मूल रूप से त्रिदिवसीय विधान बताते हुए इन्होंने कहा कि कार्तिक शुक्ल पंचमी से इस व्रत को आरंभ करे और सप्तमी को उदयकालीन सूर्यार्घ्य से इसका समापन करे।पंचमी तिथि को दिनभर उपवास और संध्या गोधुली वेला में सूर्यास्त के समय अपने घर या सूर्यमंदिर के प्रांगण में ताम्र कलश की स्थापना कर उस पर सूर्य का आवाहन करे और हविष्यान्न का भोग लगावे।धूप,दीप आदि अर्पण करे और वही हविष्यान्न प्रसाद स्वरूप ग्रहण करे तथा भगवान आदित्य का स्मरण करते हुए रात्रि में भूमि पर शयन करे।दूसरे दिन प्रातः काल पुनः षष्ठी को उपवास व्रत का संकल्प ले।इस दिन अन्न और जल का परित्याग करे।संध्या वेला में जलाशय के निकट जाकर चौरंगे मंडप बनाकर नानाविध पक्वान्न, फल ,नैवेद्य आदि से सान्ध्य अर्घ्य प्रदान करे और रात्रि जागरण कर गीत वाद्यादि से भगवान सूर्य को प्रसन्न करे।दूसरे दिन प्रातः सूर्योदय के समय केला,नारियल, दूध,पुष्प ,धूप,दीप और पक्वान्न आदि सहित सूर्य के बारह नामों का स्मरण करते हुए अर्घ्य प्रदान कर व्रत का समापन करे।वैसे आजकल प्रचलन में यह सूर्यषष्ठी व्रत चारदिवसीये मनाया जाता है।
भविष्योत्तर पुराण में भी इस व्रत के विधान पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है।महर्षि च्यवन के वार्धक्य निवारण हेतु उनकी पत्नी सुकन्या के द्वारा नागकन्याओं के बताये विधान से सूर्योपासना और सूर्यषष्ठी व्रत का विधान बताया गया है।
गयाजी के तीन प्राचीन सूर्य मंदिर….
गयाजी में प्रातः ,मध्याह्न और सायं काल के व्याज से लगभग सृष्टि के आरंभ में ही तीन सूर्य मंदिरों की स्थापना की गई थी।प्रातःकालीन हेड मानपुर, मध्याह्न कालीन ब्राह्मणीघाट, सांध्यकालीन विष्णुपद के निकट सूर्यकुंड तालाब के पश्चिमी तट पर।ऐसी किंवदन्ती है कि ये तीनो ही मंदिर तत्कालीन गयाजी के शासक असुर वंशीय गय के द्वारा निर्मित करवाकर सूर्य विग्रहों की स्थापना की गई थी। बाद में इनके जीर्णोद्धार का कांर्य मानभूम के राजा मानसिंह के द्वारा किया गया।इन्होंने ही मानपुर शहर भी बसाया था।तीनो ही मंदिरों में स्थापित विग्रह पूर्णतः मूर्तिनिर्माण की शास्त्रोक्त पद्धति से निर्मित हैं।उड़ीसा शैली में निर्मित ये विग्रह अतुलनीय हैं।ब्राह्मणीघाट में सूर्य की प्रतिमा अपने पूरे परिवार के साथ स्थापित है।जबकि सूर्यकुंड एवं मानपुर में सूर्य के दोनो पुत्र शनि और यम स्थापित हैं।सांध्यर्घ की वेला में सूर्यकुंड स्थित मंदिर का दर्शन एवं सूर्यकुंड में जलार्पण कर अर्घ्य प्रदान किया जाता है।
स्थान की संकीर्णता और उमड़ते जनशैलाव के मद्देनजर ब्राह्मणीघाट स्थित सूर्यमंदिर का विशाल और भव्य फलक विशेषकर छठ जैसे महापर्व पर उपयोग्य होते हैं।प्रातःकालीन अर्घ्य हेतु वैसे तो हेड मानपुर स्थित सूर्यमंदिर का प्रांगण उपयोग्य है लेकिन दूरी और रास्ते की संकीर्णता के कारण नगर वासियों के लिये वहाँ तक पहुंच पाना दुस्कर सिद्ध होता है।अतएव शहर में रहने वाले या शहर के निकटस्थ ग्रामीण क्षेत्रों से आनेवाले व्रतियों एवं उनके परिजनों के लिए सूर्यकुंड और ब्राह्मणीघाट ही ज्यादा उपयोगी होते हैं।यहाँ तक रेलवे स्टेशन या बस पड़ाव से आवागमन भी आसान है।
इन तीनों ही मंदिरों के विग्रह आज भी जीवंत हैं।जो कोई भी अपनी किसी भी मनोकामना को लेकर यहाँ अनुष्ठान संपन्न करता है भगवान भास्कर उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं।


