हाथी के बेकाबू होने पर परंपरा पर रोक क्यों ? प्रशासन से 4 बड़े सवाल
अद्यतन कालक्रम संवादसूत्र : वाराणसी
रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में हाथी के बेकाबू होने की घटना दुर्भाग्यपूर्ण है, पर इस एक घटना की आड़ में सैकड़ों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत पर ही प्रश्नचिन्ह लगाना कहाँ तक उचित है? इस विषय पर आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक” ने जिला प्रशासन और वन विभाग से तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत दुखद है कि एक आपात स्थिति को आधार बनाकर संपूर्ण ऐतिहासिक आयोजन के स्वरूप को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।

आप अपने आसपास के खबरों के लिए चैनल को सब्स्क्राइब कर लें
आचार्य जी द्वारा उठाए गए 4 प्रमुख प्रश्न –
1- क्या परंपरा बंद करना समाधान है?
रामनगर की रामलीला कोई साधारण मेला नहीं, सैकड़ों वर्षों पुरानी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। यदि जोखिम को आधार बनाया जाए तो यहाँ उमड़ने वाले लाखों के जनसैलाब में हमेशा भगदड़ का खतरा रहता है, तो क्या भीड़ का हवाला देकर इस जन-आस्था को बंद कर दिया जाना चाहिए?
2- क्या जिम्मेदारी केवल आयोजकों की है?
इतने विशाल अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजन की सुरक्षा का संपूर्ण दारोमदार क्या केवल आयोजकों पर थोपा जा सकता है? क्या राज्य और स्थानीय प्रशासन की यह जिम्मेदारी नहीं कि वह हर संभव सहयोग करे?
3- वन विभाग (डीएफओ वाराणसी) की विफलता पर सवाल –
आचार्य ने सवाल उठाया कि 12-15 घंटे तक बेकाबू हाथी पर नियंत्रण न पाना वाराणसी जैसे टप्च् जिले के वन विभाग की घोर लापरवाही है। आयोजन के दौरान हाथी को शांत करने वाले आवश्यक इंजेक्शन, दवाइयां और उपकरण स्टॉक में क्यों नहीं थे? अंत में स्थिति संभालने के लिए गोरखपुर चिड़ियाघर से एक्सपर्ट टीम क्यों बुलानी पड़ी?
4- कागजी परमिट क्या हाथी को नियंत्रित करेगा?
क्या कोई क्थ्व् या पशु चिकित्सक गारंटी दे सकता है कि श्स्वस्थश् घोषित हाथी कभी बेकाबू नहीं होगा? प्रकृति पर कागजी परमिट का नियंत्रण नहीं होता। बेकाबू हाथी को कोई अनुमति पत्र नहीं, बल्कि प्रशिक्षित टीम और संसाधन ही काबू करते हैं। इस तरह की कागजी शर्तें अपनी विफलता छिपाने का बहाना मात्र हैं। 
निष्कर्ष – आचार्य धीरज द्विवेदी ने कहा कि समस्या परंपरा में नहीं, प्रशासनिक तालमेल की कमी और आपात संसाधनों के अभाव में है। परंपराओं पर रोक लगाने के बजाय आधुनिक सुरक्षा तकनीक और सकारात्मक सहयोग सुनिश्चित किया जाए।


